Geeta from 1 to 6 Chapter गीता अध्याय 1 से 6 तक

Geeta from 1 to 6 Chapter गीता अध्याय 1 से 6 तक

कृपया सभी ब्लॉग पढ़ें और प्रारंभ से,शुरुआत के संदेशों से क्रमशः पढ़ना शुरू करें तभी आप सम्पादित किये गए सभी विषयों की कड़ियाँ जोड़ पायेंगे। सभी विषय एक साथ होने के कारण एक तरफ कुछ न कुछ रूचिकर मिल ही जायेगा तो दूसरी तरफ आपकी स्मृति और बौद्धिक क्षमता का आँकलन भी हो जायेगा कि आप सच में उस वर्ग में आने और रहने योग्य हैं जो उत्पादक वर्ग पर बोझ होते हैं।

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शनिवार, 1 सितंबर 2012

प्रथम अध्याय: अर्जुन विषाद योग ( भूमिका ) Chep.I.Arjun's dipreshan activity ( Preface)

धृत राष्ट्र उवाच

 धर्म क्षेत्रे कुरु क्षेत्रे  समवेताः युयुत्सवः 

धर्म क्षेत्र और कर्म क्षेत्र में एक साथ इकठ्ठे हुए युद्ध को उत्सुक 

मामकाः पाण्डवा: च  एव  किम अकुर्वत संजय ।। 1/1 ।।

 मेरे और पांडव के भी, पुत्रो ने,  अकुर्वत न करने योग्य,क्या कर्म (कूबद ) की  है। 

 संजय उवाच 

दृष्ट्रवा  तु  पाण्डवानीकम  व्युढ़म  दुर्योधनः  तदा 

देख कर पांडवों की तरफ की सेना की व्यूह रचना को दुर्योधन ने तब 

आचार्यम  उपसंगम्य   राजा   वचनं   अब्रवीत             ।। 1/2 ।।

आचार्य ( द्रोण ) के बाजू में खड़े राजा (दुर्योधन ) ने (अब्रवीत)  लापरवाही से कहा

पश्य   एताम   पांडुपुत्राणाम  आचार्य   महतीम चमूम 

 देखिये  आचार्य ! इस पांडू पुत्रों की महत्त्व पूर्ण चहुँमुखी 

व्युढाम  द्रुपदपुत्रेण  तव   शिष्येण   धीमता         ।। 1/3 ।।

सैन्य   व्युहरचना को, द्रुपद के पुत्र आपके शिष्य की बुद्धिमता

अत्र   शूरा:  महेष्वासा:  भीमार्जुन  समा:  युधि 

यहाँ शूरवीर महा धनुषधारी भीम और अर्जुन समान योद्धा

युयुधान:   विराट:   च  द्रुपद:  च  महारथ:           ।। 1/4  ।।

युयुधान और विराट और द्रुपद जैसे महारथी

धृष्टकेतु:   चेकितान:  काशिराज:  च  वीर्यवान 

दृष्टकेतु चेकितान  और काशिराज जैसे वीर्यवान वीर 

पुरूजित   कुन्ति  भोज:  च   शैव्य:  च नर पुंगव :   ।।  1/5  ।।

पुरुजीत और कुन्तिभोज और शैव्य जैसे नरपुंगव(बहुत से लोगों से अकेले पंगा लेने वाले)

 युधामन्यु:  च   विक्रांत:  उत्तमौजा:  च  वीर्यवान 

और युद्धामंयु विक्रांत  उत्तमौजा जैसे वीर्यवान 

सौभद्र:   द्रौपदेया: च  सर्वे    एव    महारथा:        ।।  1/6  ।।

सुभद्रा पुत्र और द्रोपदी के सभी महारथी पुत्र 

अस्माकं   तु   विशिष्टा:  ये   तान  निबोध  द्विजोतम 

अपनी तरफ के भी विशिष्ट जो भी हैं इन्हें भी निर्विध्न समझिये द्विजों में उत्तम आचार्य !

नायका:  मम  सैन्यस्य  संज्ञार्थं  तान  ब्रवीमि  ते  ।।  1/7  ।।

नायक (हीरो ) जो मेरे तरफ की सेना के हैं  उनके संज्ञा नाम बताता हूँ आपको 

भवान  भीष्म: च  कर्ण: च  कृप: च  समितिंजय: 

आप खुद भीष्म और कर्ण और आचार्य कृप जैसे जो अकेले ही इस सीमित सेना पर जय करने वाले  हैं  

अश्वत्थामा  विकर्ण: च सौमदत्ति:  तथा  एव च ।।  1/8  ।।

अश्वस्थामा और विकर्ण और  सोमदत्त के पुत्र भी तथा 

अन्ये च बहव: शुरा: मदर्थे  त्यक्तजीविता:

अन्य बहुत सारे शूर हैं,  मेरे लिए जीवित रहने तक लड़ने वाले 

नाना शस्त्र प्रहरणा: सर्वे  युद्ध  विशारदा:          ।।  1/9  ।।

आनेकानेक प्रकार के शस्त्रों से प्रहार करने में निपूण युद्ध विशारद 

अपर्याप्तं तत  अस्माकं  बलम  भीष्माभिरक्षितम

अपर्याप्त(दूर दूर तक फैल़ा हुआ) है अपनी तरफ का बल जो भीष्म द्वारा रक्षित भी तो है।

पर्याप्तं   तु   इदं  एतेषां  बलम भीमाभिरक्षितं ।।   1/10  ।।

पर्याप्त (चारों तरफ से आप्त,घिरा हुआ सा )इनका यह बल भीम द्वारा रक्षित है 

अयनेषु  च    सर्वेषु   यथाभागम अवस्थिता:

और सभी मोर्चों पर उचित भूभाग पर अवस्थित हुए  

भीष्मं  एव अभिरक्षन्तु भवंत: सर्वे एव हि   ।।  1/11  ।।

आप भीष्म द्वारा सभी रक्षित हैं।

तस्य  संजनयन  हर्षम  कुरु वृद्ध:  पितामह:

तब उसके हर्ष उत्पन्न करने के लिए कुरु वृद्ध पितामह ने 

सिंहनादं  विनद्य  उच्चै: शंखं  दध्मौ  प्रतापवान ।।  1/12  ।।

सिंह की दहाड़ के समान नाद पैदा करते हुए उच्चध्वनी विस्तारक शंख बजाया प्रतापी ने 

तत:  शंखा:  च  भेर्य: च   पणवानक गोमुखा: 

तब फिर शंख, नगारे,तुरई  ढ़ोल ,मृदंग 

सहसा एव अभ्यहन्यन्त  स: शब्द: तुमुल: अभवत  ।।  1/13  ।।

भी सहसा एक साथ तुमुल ध्वनी (मिलीजुली ध्वनी ) कर के बज उठे .

ततः श्वेतै:  हयैः युक्ते  महति  स्यन्दने  स्थितौ  

तभी वहां श्वेत घोड़ों महत रथ में स्थित  हुए 

माधव: पाण्डवः  च  एव  दिव्यौ  शन्खौ  प्रदध्मतु:   ।।  1/14  ।।

माधव और पांडव ने भी दिव्य शंख बजाये 

पान्चजन्यम  हृषीकेशः   देवदत्तं  धनञ्जय:

पान्चजन्य को हृषिकेश ने देवदत्त को धनञ्जय ने 

पौण्ड्रम  दध्मौ  महाशंखं  भीम कर्मा  वृकोदर: ।।   1/15  ।।

पौंड्र  महाशंख बजाय़ा भारी भरकम काम करने वाले वृकोदर ने 

अनंत विजयं  राजा कुंती पुत्र युधिष्ठिर:

अनंत विजय बजाया  कुंती पुत्र राजा युधिष्ठिर ने 

नकुल: सहदेवः च सुघोष मणिपुष्पकौ         ।।  1/16  ।।

नकुल और सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक 

काश्यः च परमेष्वासः शिखंडी च महारथः 

परम धनुषधारी काशिराज और महारथी शिखंडी 

धृष्टद्युम्न  विराट:   च  सात्यकि: च  अपराजितः ।।  1/17  ।।

धृष्टद्युम्न, विराट, और सात्यकि जैसे अपराजित  रहने वाले

द्रुपदः द्रौपदेया: च  सर्वश: पृथिवीपते

 द्रुपद और  द्रोपदी के सभी पृथ्वीपति पुत्रों ने 

सौभद्र: च   महाबाहू:शंखान दध्मु: पृथक पृथक  ।।  1/18  ।।

और माहाबाहू सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु ने अलग अलग शंख बजाये।

सः घोषः  धार्त राष्ट्राणाम   हृदयानि व्यदारयत 

उस  ध्वनी घोष ने धृतराष्ट्र के  पक्ष के ह्रदय विदीर्ण कर दिए  

नभः  च पृथिवीम च  एव    तुमुलः व्यनुनादयन .।।  1/19  ।।

और नभ और पृथ्वी के बीच तुमुल नाद अनुनाद पैदा कर दिया 

अथ  व्यवस्थितान  दृष्टवा  धार्तराष्ट्रान  कपिध्वज:

उस समय व्यवस्थित देख कर धार्त राष्ट्रों को, कपिध्वज वाले रथपर सवार 

प्रवृत्ते   शस्त्रसम्पाते  धनुः  उद्यम्य  पाण्डवः          ।।1/20  ।।

पांडव,  धनुष नामक  शस्त्र को संभाल कर, उद्यम को प्रवृत हुआ 

हृषीकेशम  तदा  वाक्यं  इदं  आह   महीपते 

 तब फिर हृषिकेश को महिपते (अर्जुन )ने यह वाक्य कहा 

अर्जुन-उवाच

सेनयो: उभयो:  मध्ये  रथं  स्थापय  मे अच्युत      ।।  1/21  ।।

अच्युत  !  उभय पक्षी सेना के मध्य मेरे रथ को खड़ा करो ।

यावत्  एतान  निरीक्षे  अहम्  योद्धुकामान  अवस्थितान  

जब तक इन युद्ध की कामना से इकठ्ठे हुए योद्धाओं का निरिक्षण करूँ रथ खड़ा रखना 

कैः  मया  सह  योद्धव्यम  अस्मिन  रणसमुद्यमे    ।।  1/22   ।।

किस किस के साथ मुझे युद्ध करना है, कोन कोन रण में सम उद्द्यत हैं 

योत्स्यमानान  अवक्षे अहम्  ये  एते  अत्र समागताः 

 युद्ध को ही अधिकार मानने वालों को आमने सामने देखुं जो जो यहाँ एक साथ हैं

धार्तराष्ट्रस्य  दुर्बुद्धे: युद्धे  प्रियचिकीर्षवः                ।।  1/23  ।। 

राष्ट्र के प्रति धृति वाले इन दुर्बुद्धि वालों की  युद्ध ही   प्रिय अभिलाषा  हैं।

 संजय उवाच  

एवम  उक्तः    हृषीकेश:  गुडाकेशेन  भारत  

इस प्रकार से उक्त कहते हुए हृषिकेश ने  निद्रा को जीतने वाले (अनिंद्रा रोगी )गुड़ाकेश भारत  को  कहा 

सेनयो:  उभयो: मध्ये  स्थापयित्वा   रथोत्तमम    ।।  1/24 ।।

दोनों उभयपक्षी सेना के मध्य  उत्तमरथ को  स्थापित करके 

भीष्म  द्रोण  प्रमुखतः   सर्वेषाम  च   महीक्षिताम  

प्रमुखत: भीष्म द्रोण  और सभी प्रमुख महाराजों के सामने देखते हुए  

उवाच  पार्थ  पश्य  एतान  समवेतान  कुरून   इति  ।।   1/25  ।।

पार्थ से  कहा ; देख इन एक साथ जुटे हुए कोरवों को 

तत्र  अपश्यत  स्थितान  पार्थः  पित्रिन   अथ  पितामहान  

तब पार्थ ने वहां उपस्थितों को देखा कि यहाँ तो पितामह सहित पूरा पितृकुल  है  

आचार्यान  मातुलान  भ्रात्रिन  पुत्रान पौत्रान सखीन तथा ।। 1/26 ।।

आचार्य मातृकुल  भाई पुत्र पोत्र सखा सम्बन्धी तथा 

श्वशुरान  सुहृदः  च  एव  सेनियो: उभयो:  अपि   

श्वसुर और सुहृदयी भी दोनों पक्षों में है।

तान  समीक्ष्य  स: कौन्तेयः  सर्वान  बंधून अवस्थितान।।1/27 ।।

उन उपस्थित सभी बंधू बांधवों की  समीक्षा करता  हुआ   कौन्तेय 

कृपया  परया   आविष्ट:  विषीदन  इदम   अब्रवीत   

करुणा से पूरी तरह आवेशित  विष का घूँट  पिते  हुआ सा बोला 

  अर्जुन-उवाच  

दृष्ट्रवा  इमम स्वजनं  कृष्ण  युयुत्सुम  सम उपस्थितम  ।। 1/28 ।।

देख कर इन तमाम स्वजनों को कृष्ण ! युद्ध को उत्सुक सम उपस्थितों को 

सीदन्ति  मम   गात्राणि   मुखंम  च  परिशुष्यति  

दाँत कटकटा  रहे हैं अंग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा हैं। 

वेपथुः   च   शरीरे   मे   रोमहर्ष   च    जायते              ।।   1/29   ।।

और मेरा शरीर कांप रहा है और रोंगटे खड़े हो गए हैं।

गाण्डीवं   संत्रसते   हस्तात  त्वक  च  एव  परिदह्यते

गांडीव हाथ से फिसल रहा है और त्वचा भी जल रही है।

न  च  शंक्रोमि  अवस्थातुम  भ्रमति   इव  च मे  मनः  ।।  1/30  ।।

और न तो इस अवस्था में खड़ा रहने में समर्थ हूँ और मेरा मन भी भ्रमित हो रहा है .

निमित्तानि  च  पश्यामि   विपरीतानि   केशव  

(युद्ध का ) निमित भी विपरीत देख रहा हूँ केशव !

न   च  श्रेयः  अनुपश्यामि  हत्वा  स्वजनम  आहवे   ।।  1/31   ।।

और न यह श्रेयकर  देख रहा हूँ स्वजनों की ह्त्या का आह्वान 

न  कान्क्षे   विजयं  कृष्ण  न  च   राज्येम  सुखानि  च  

नहीं आकांक्षा विजय की कृष्ण !और  न  ही राज्य के सुख की 

किम  न:  राज्येन  गोविन्द  किम  भोगै: जीवितेन  वा  ।। 1/32  ।।

कैसा हमें राज्य से  गोविद ! कैसा जीवन के भोगों से  प्रयोजन 

येषां  अर्थे कांक्षितम  नः  राज्यं  भोगाः  सुखानि  च 

जिन के हितार्थ आकांक्षा करते हैं हम राज्य के भोगों की और सुखकी  

ते  इमे  अवस्थिताः  युद्धे  प्राणान  त्यक्त्वा  धनानि  च ।। 1/33 ।।

वे सब तो अवस्थित हैं युद्ध में प्राण और धन त्याग कर  और 

आचार्याः पितरः पुत्राः तथा  एव  च  पितामहा: 

आचार्य और चाचा ताऊ पितर पुत्र तथा पितामह भी 

मातुलाः श्वशुरा:  पौत्राः  श्यालाः सम्बंधिन:  तथा    ।।  1/34  ।।

मामा  श्वसुर पोते साले सम्बन्धी तथा 

एतान  न हन्तुम  इच्छामि  घ्नतः  अपि मधुसूदन

इन सब को कभी नहीं  मारने की  इछा!   मारना भले ही   मधुसुदन !

अपि  त्रैलोक्यराज्यस्य  हेतो:  किम नु महीकृते       ।।   1/35   ।।

त्रिलोकी  के  राज्य के  हेतु भी हो तो फिर उपजाऊ भूमि के लिए तो क्या ?

निहत्य  धार्त राष्ट्रां  नः  का प्रीति:  स्यात  जनार्दन 

मारना  धृतराष्ट्र के पुत्रों को हमें कैसे  प्रिय लगेगा जनार्दन !

पापं  एव  आश्रयेत   अस्मां हत्वा एतां  आततायिनः     ।। 1/36   ।।

पाप का ही आश्रय है हमारे लिए इन आततायियों की ह्त्या 

तस्मात्  न  अर्हा:  वयं  हन्तुम   धार्तराष्ट्रां स्वबान्धवान 

इस  तरह  नहीं योग्य  हम मारने के  लिए धृतराष्ट्र के पुत्रो व् बंधू बांधवों को  

स्वजनं  ही कथं हत्वा   सुखिनः स्याम  माधव     ।। 1/37  ।।

क्योंकि कहो स्वजनों की कैसे ह्त्या करके सुखी होंगे  माधव !

यद्यपि   एते  न  पश्यन्ति लोभ अपहत   चेतसः 

यद्यपि ये लोग नहीं देख प़ा रहे लोभ द्वारा आहत हुई चेतना  के कारण 

कुलक्षय कृतं  दोषम  मित्र द्रोहे च पातकं     ।।  1/38  ।।

कुल का क्षय करने वाले दोष को और मित्र द्रोह के पाप को 

कथं  न ज्ञेयं  अस्माभि:   प़ापात  अस्मात  निवर्तितुम 

कहो क्यों नहीं जानते हम लोग इस पाप से निवर्त होने का मार्ग 

कुलक्षय  कृतं   दोषम  प्रपश्यद्भी: जनार्दन    ।।  1/39 ।।

कुल के क्षय के दोष पूर्ण कार्य को देख जान कर भी जनार्दन !

कुलक्षये  प्रणश्यन्ति   कुलधर्मा:  सनातनाः 

कुल के क्षय से नष्ट हो जाते हैं सनातन कुलधर्म

धर्मे  नष्टे  कुलं  कृत्स्नंम  अधर्म:  अभिभवती उत   ।।  1/40   ।।

कुल के धर्म नष्ट हो जाने पर सारे  कुल में अधर्म फ़ैल जाएगा 

अधर्म  अभिभवात  कृष्ण  प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः
अधर्म के बढ जाने से कृष्ण !प्रदूषित हो जाती है कुल की स्त्रियाँ  

स्त्रीषु   दुष्टासु  वार्ष्णेय  जायते  वर्णसंकर:         ।।   1/41   ।।

 स्त्रियाँ जब दुष्ट हो जाती है तो जन्मते वर्ण संकर 

संकर:  नरकाय  एव   कुलन्घानाम  कुलस्य च 

वर्ण संकर नरक में ले जाते हैं,  कुलघाती, कुल को ही 

पतन्ति   पितर:  हि  एषां  लुप्त पिण्डोदक क्रिया:  ।।   1/42   ।।

पतन हो जाता है पितरों का क्योंकि ऐसे में पिण्ड दान क्रिया लुप्त हो जाती है।

दोषैः  एतै:   कुलघ्नानाम    वर्णसंकरकारकै:

इन   कुलघातियों के वर्ण संकर कारक दोषों से 

उत्साद्यन्ते   जातिधर्मा:  कुलधर्मा:  च शाश्वता:     ।।   1/43   ।।

उत्सर्जित  हो जाते है जाति धर्म और शास्वत कुल धर्म 

उत्संन्न कुलधर्माणाम  मनुष्याणाम   जनार्दन 

उठ जाते हैं कुलधर्म मानुष्यों  के जनार्दन 

नरके अनियतम  वासः  भवति  इति  अनुशुश्रुम   ।।  1/44   ।।

तो नरक में नियत के विपरीत वास करते हैं ऐसा सुनते आये हैं 

अहो   बत महत पापम   कर्तुम  व्यवसिता: वयं 

अहो बहुत महत पाप करने वाला व्यवसाय हम 

यत राज्य सुख लोभेन  हन्तुम  स्वजनं  उद्यताः    ।।   1/45 ।।

जो कि राज्य के  सुख के लोभ में स्वजनों को मारने को उद्यत हो गए  

यदि माम  अप्रतिकारम   अशस्त्रं   शस्त्रपाणयः

यदि मुझ शस्त्रहीन अप्रतिकारी को शस्त्र धारण किये  हुए

धार्तराष्ट्रा:  रणे  हन्तु:  तत  मे  क्षेमतरम  भवेत्   ।।    1/46  ।।

धृतराष्ट्र के पुत्र रण में मार दें तब भी मेंरे लिए  कुशल क्षेम होगा 

संजय उवाच

एवं   उक्त्वा   अर्जुन:  संख्ये रथोपस्थे   उपाविशत 

इस प्रकार अर्जुन ने सैद्धान्तिक धारणा बता कर रथ के पीछे के भाग पर बैठ गया 

विसृज्य सशरम   चापं शोक संविग्र मानस:   ।।  1/47   ।।    
उतार कर बाण सहित धनुष को  शोक से संवेदित मानसिकता से  

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्री कृष्णार्जुनसंवादे$र्जुनविषादयोगो नाम प्रथमो$ध्यायः 

ॐ ॐ आकार ही तत  अपरिमेय विशाल क्षेत्र में फैले हुए तत्व का वह सत है जो ब्रह्म को बांधता है।इति  बस इतना सा सत्य है।

        ॐ आकार को लेकर सबसे अधिक प्रकार की  भ्रांतियां फैली हुई है।एक इस सच्चाई को प्रति क्षण ध्यान में रखें कि इस अपने आपके शरीर और देह में ही वह सभी कुछ है जिसका वर्णन आप वेद-उपनिषदों शास्त्रों में पढ़ते सुनते आये हैं।ॐ आकार मनुष्य के देह में स्थित शरीर की आकृति है . जिस तरह काम का श्री गणेश करते हैं तो बुद्धि के देवता गणेश की पूजा करते हैं .बिस्मिल्लाह करते हैं .उसी तरह जब कार्य संपन्न हो जाता है तो उसे ॐ तत सत कह कर समाप्त किया जाये तो वह मानव मात्र के लिए कल्याणकारी हो जाता है। 

 श्री मत यह वह मत है जो श्री ( सम्पन्नता समृधि )और श्रेय (प्रिय एवं उचित फल ) देता है क्योंकि यह भगवत भगवान  द्वारा निर्मित ( प्रकृति प्रदत ) इस जगत की  सर्वश्रेष्ट रचना (मनुष्य योनी की देह ) के बारे में अशेशेण कहा गया यह मत जो है वह   गीता  गीत की तरह ग़ाया जाता है।उपनिषद् सु यह भी  सभी अन्य उपनिषदों की तरह ही गुरु-शिष्य की व्यक्तिगत वार्ता के रूप में एक आख्यान है । ब्रह्म विद्या  ब्रह्मविद्या ( साईको टेक्नोलोजी ) का  योग उपयोग-प्रयोग-व्यवहार में लाने का   शास्त्र सेन्स और साईंस की  उभय पक्षी जानकारी है। श्री कृष्ण अर्जुन संवाद जो श्री कृष्ण अर्जुन के बीच संवाद /डाईलोग के रूप में हैं अर्जुन विषाद योग नाम प्रथम अध्याय   अर्जुन विषाद योग नाम से यह प्रथम अध्याय है .


बुधवार, 1 अगस्त 2012

द्वितीय अध्याय: (पूर्वार्ध ) सांख्य Second Chapter (First Half ) Status stetistics (upto shlok no.41)

 संजय उवाच 

तं  तथा  कृपया  अविष्टम  अश्रु पूर्णा  कुलेक्षणम
उस करुणा से आवेशित व्याकुल आँखों में आंसू लिए हुए 
विषीदन्तम  इदं वाक्यं  उवाच   मधुसूदन:    ।।  2/1  ।| 
भींचे हुए जबड़े वाले अर्जुन से कहा मधुसुदन ने 

श्री भगवानुवाच 

कुतः   त्वा  कश्मलं   इदम   विषमे  समुपस्थितं  
क्यों और कैसी  तुम्हारी यह कशमकश,कसमसाहट! विषम स्थिति में सम उपस्थित ! 
अनार्यजुष्टं अस्वर्ग्यम अकिर्तिकर्म  अर्जुन   ।।   2/2  ।।
यह अनार्य जैसा झूठा आचरण अस्वर्ग  प्राप्त कराने वाला अकीर्ति वाला कर्म है अर्जुन ! 
क्लैव्यम  मा  स्म  गमः  पार्थ  न  एतत  त्वयि  उपपद्यते 
क्लेश के कारण उत्पन हुए अवसाद को प्राप्त मत हो पार्थ !नहीं यह आचरण तुम्हारे पद के उपयुक्त है।
क्षुद्रं   ह्रदय दौर्बल्यं  त्यक्त्वा उतिष्ठ   परन्तप।। 2/3 ।।
क्षुद्र ह्रदय दुर्बलता को त्याग कर खड़ा हो जा परमतपस्वी !

 अर्जुन  उवाच

कथं भीष्मं अहम्  संख्ये द्रोणं च मधुसुदन
कहो कैसे मैं सिद्धान्ततः भीष्म और द्रोण से,  मधुसुदन !
इषुभिः  प्रति योत्स्यामि पृजाहौं  अरिसूदन   ।।   2/4  ।।
इन चुभने वाले बाणों से युद्ध प्रतिरोध  करूं, जिनकी पूजा करता हूँ, अरिसूदन !
गुरुन  हत्वा हि महानुभावान श्रेयः भौक्तुम भैक्ष्यम
जबकि महानुभावोँ गुरुओँ की ह्त्या से श्रेष्ट भिक्षा भोजन है।
अपि इह लोके हत्वा  अर्थकामान तु गुरून इह एव 
ईह लोक में अर्थ की कामना से ह्त्या! किन्तु गुरुओं की 
भुञ्जीय भोगान रुधिर प्रदिग्धान  ।।  2/5  ।।
भोग ही तो भोगूंगा रुधिर के प्रतिफल में 
न च एतत  विंद्य: कतरत  नः गरीयः
और फिर न तो यह वन्दनीय करतूत है न गरिमामय  
यत वा जयेम यदि वा नः जयेयु 
या तो वे जीत लिए जाएँगे या यदि नहीं जीत पायेंगे
यान एव हत्वा  न जिजीविषाम:
इनको मार कर तो जिजीविषा ही नहीं रहेगी 
ते अवस्थिताः  प्रमुखे धार्तराष्ट्रा:  ।।   2/6   ।।
ये जो अवस्थित हैं धृतराष्ट्र प्रमुख 
कार्पण्य दोष उपहत स्वभाव:पृच्छामि त्वाम
 अपराध बोध से पैदा हुयी कायरता के दोष से उपहत हुए स्वभाव से पूछता हूँ तुम्हें 
धर्म सम्मूढ़चेता: यत श्रेय:स्यात निश्चितं  ब्रूहि तत 
धर्म  के प्रति चेतना में सम्मूढ़ता आ गयी है अतः जो उचित और प्रिय हो उसे निश्चित करके कहो
मे शिष्य:ते अहम् शाधि माम त्वाम प्रपन्नम ।।  2/7   ।।
मुझे, शिष्य हूँ तुम्हारा, सदबुद्धि मुझे तुम्हारी शरण में हूँ।
न हि प्रपश्यामि मम अपनुद्यात यत शोकम उच्छोषणम  इन्द्रियाणाम
नहीं क्योंकि दिखता मुझे,जो दूर कर सके इस मेरे सुखाने वाले इन्द्रियों के शोक को 
अवाप्य भूमौ असपत्नं ऋद्धम  राज्यं 
प्राप्त करके भी भूमि व् निष्कंटक समृद्ध राज्य 
सुराणाम अपि च आधिपत्यं  ।।   2/8   ।
और सुरों का आधिपत्य भी 
संजय उवाच 
एवं उक्त्वा हृशिकेषम गुडाकेशः परन्तप 
और इस तरह कह कर हृषिकेश को गुड़ाकेश परंतप ने 
न योत्स्ये  इति गोविन्दम उक्त्वा तूष्णीम बभूव ह ।।  2/9  ।।
"नहीं युद्ध करूंगा " इतना गोविन्द को कहकर चुप हो गया
तम उवाच हृषीकेशः प्रहसन  इव भारत
उसे कहा हृषिकेश ने प्रहसन में (हंसते हुए) भारत !
सेनयोः  उभयोः मध्ये विषीदन्तम इदम वचः ।। 2/10 ।।
उभय पक्षी सेना के मध्य दांत किटकिटा रहे भारत को ये वचन कहे 
श्री भगवानुवाच 
अशोच्यान अन्वशोच: त्वं  प्रज्ञावादान  न भाषसे 
गलत सोच कर गलत अन्वेषण कर के तुम प्रज्ञावान  की तरह भाषण दे रहे हो  
गतासून आगतासून च न  अनुशोचन्ति पंडिता:    ।।  2/11  ।।
गति हो गयी है या वापस आयेगा इस पर नहीं सोचते पंडित जन 
न तु एव अहम् जातु न आसम न त्वं न इमे जनाधिपा: 
किन्तु न तो ऐसा है कि कदाचित मैं नहीं उपस्थित था,न तुम न ये जन अधिपति  
न च एव न भविष्यामः सर्वे वयम अतः परम  ।।   2/12   ।।
और न ही ऐसा है कि भविष्य में हम सब नहीं रहेंगे, अतः परम को जान   
देहिनः अस्मिन यथा देहे कौमारं यौवनं जरा 
देहि जिस तरह इस देह को कौमार्य से यौवन और यौवन से जर्जर अवस्था में ले जाती है
तथा देहांतर प्राप्तिः धीरः तत्र न मुह्यति  ।।   2/13  ।।
उसी तरह देहांत के अंतराल अंतरादेह प्राप्ति भी करा देती है धैर्यवान उस विषय पर मोहित नहीं होते 
मात्रा स्पर्शाः  तु कौन्तेय शीतोष्ण सुखदुःखदा:
मात्र स्पर्श सर्दी गर्मी से कौन्तेय ! सुख दुःख होता है किन्तु 
आगमापायिन: अनित्याः तान तितिक्षस्व भारत ।।  2/14   ।।
आने जाने वाला अनित्य होता है  उसके लिए स्वयं ( की इन्द्रियों ) को सहनशील बना  
यम हि न व्यथयन्ति  एते पुरुषम पुरुष ऋषभ
ताकि ऐसे निर्णायक काल में तब व्यथित नहीं करती पुरुष को पुरुष ऋषभ
सम दुःख सुखं धीरं सः अमृत तत्वाय कल्पते   ।।  2/15   ।।
सम रहे दुःख सुख में धीरज रखे वह अमृततत्व को कल्पपर्यंत प्राप्त करता रहता है। 
न असत:विद्यते भाव:न अभाव:विद्यते सत:
न तो असत में विद्यमान रह पाता है भाव, न अभाव में विद्यमान रह पाता है सत 
उभयो: अपि दृष्ट: अन्तः तु अनयोः तत्व दर्शिभि:  ।।   2/16   ।।
इन दोनों उभय पक्षी भावों के लिए ऐसा ही देखा गया है, तत्व दर्शियों द्वारा 
अविनाशि  तु तत विद्धि येन सर्वम इदम ततम 
अविनाशी तो किन्तु उसे जान जो सर्वत्र इधर उधर फैला है 
विनाशं अव्ययस्य अस्य न कश्चित कर्तुम अर्हति  ।।  2/17 ।।
विनाश इस अव्यय का नहीं  किंचितमात्र करना संभव है।
अन्तवन्तः इमे देहाः नित्यस्य  उक्ता: शऱीरिण:
अंततोगत्वा अंत इन सब देहों का होता है नित्य रहने वाला कहा गया है शरीर 
अनाशिनः अप्रमेयस्य तस्मात् युध्यस्व भारत   ।। 2/18 ।।
इसका नाश नहीं होता  ना ही इसकी मात्रा को नापा जा सकता इसलिए युद्ध स्वीकार कर भारत !
यः एनम वेत्ति हन्तारं यः च एनम मन्यते हतम 
जो इस शरीर को समझता है मरने वाला और जो इस शरीर को मानता है मारने वाला 
उभौ तौ न विजानीतःन अयम हन्ति न हन्यते   ।।  2/19 ।।
वे दोनों ही पक्ष नहीं जानते कि न तो यह मरता है न मारा जाता है 
न जायते म्रियते वा कदाचित न अयं भूत्वा भवित
 न जन्मता है न मरता है व निसंदेह कभी भी न यह भूतपूर्व होकर भविष्य में होता है  व् 
वा न भूयः अजः नित्यः शाश्वत:
 न यह उपजता है, अजन्मा नित्य शास्वत है। 
अयं पुराणः न हन्यते हन्यमाने शरीरे   ।।   2/20   ।।
यह पुराना न मरता है न मारा जाता है शरीर 

वेद अविनाशिनं नित्यं यः एनम अजम अव्ययम 

जान उस अविनाशी को नित्य जो है इस अजन्मे  अव्यय को 

कथं सः पुरुषः पार्थ कम घातयति हन्ति कम   ।।   2/21 ।।

कहो कैसे वह पुरुष पार्थ !किसको मारता है कौन मरता है 

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरः अपराणि

जीर्ण-शीर्ण वस्त्रों को जिस तरह उतारकर नए वस्त्र पहन लेता है नर बिना देर किये 

तथा शरीराणि विहाय जीर्णानि अन्यानि संयाति नवानि देह़ी।।2/22।।

उसी तरह नए शरीर के लिए त्याग देती है जीर्ण को अन्य नये को संयत कर लेती है देहि 

न एनम छिन्दन्ति शस्त्राणि न एनम दहति पावकः 

इस देहि को न तो छेद सकता है शस्त्र न इस देहि को जला सकती है अग्नि  

न च एनम क्लेदयन्ति आपः न शोषयति मारुतः    ।।   2/23  ।।

और न इस देहि को गला सकता जल न सुखा सकती वायु

अच्छेद्यः अयम अक्लेद्यः अशोष्य:एव च 

अच्छेद्य यह देहि अक्लेद्य और अशोष्य भी है 

नित्येः सर्वगतः स्थाणु:  अचल:  अयं सनातनः  ।।   2/24   ।। 

नित्य सर्वत्र  गतिशील अणुओं में स्थित अचल यह सनातन है 

 अव्यक्त:  अयं अचिन्त्य:  अयं अविकार्यः अयं उच्यते 

यह अव्यक्त है यह अचिन्त्य है यह अविकारी कही गयी है 

तस्मात् एवं विदित्वा एनम न अनुशोचितुम अर्हसि  ।।  2/25 ।।

इस तरह विद्वता से जान जाता है इस देहि को नही बाद में शोच करने योग्य रहता 

अथ च एनम नित्यजातं नित्यं वा मन्यते मृतं 

और इस तरह इस देहि को नित्य जन्मजाने और नित्य मरने वाला मनाता है 

तथापि त्वं महाबाहो न एवं शोचितुम अर्हसि     ।।   2/26  ।।

तब भी तुम्हें  महाबाहो ! नहीं इतना सोचना चाहिए 

जातस्य हि  ध्रुवः  मृत्यु: ध्रुवं जन्म मृतस्य च तस्मात् 

क्योंकि इस मान्यता से जन्मे हुए की ध्रुव है मृत्यु और ध्रुव है मरे हुए का जन्म 

अपरिहार्ये   अर्थे न त्वं शोचितुम अर्हसि   ।।   2/27   ।।

तब फिर बिना उपाय वाले इस अर्थ से नहीं तुम सोच सकते 

अव्यक्तादीनि  भूतानी व्यक्तमध्यानि  भारत 

आदि में अव्यक्त  भूत प्राणी व्यक्त मध्य में भारत !

अव्यक्त निधनानि एव तत्र का परिदेवना  ।।   2/28   ।।

अव्यक्त निधन के बाद भी तब फिर क़ाहे की पीड़ा आश्चर्य 

आश्चर्यवत  पश्यति कश्चित् एनम आश्चर्यवत वदति 

आश्चर्यवत देखता है कोई इस चक्र को तो कोई आश्चर्य चकित होकर बताता है 

तथा एव च अन्यः आश्चर्यवत च एनम अन्य: श्रुणोति 

तथा और भी अन्य  कोई आश्चर्य चकित होकर सुनता है 

श्रुत्वा अपि एनम वेद न च एव कश्चित्   ।।   2/29   ।। 

सुनकर भी कोई इस प्रक्रिया को समझ नहीं पाता कुछ भी

देह़ी  नित्यं अवध्यः अयं देहे सर्वस्य भारत 

देहि नित्य अवध्य  है इस देह में सर्वस्य भारत !

तस्मात् सर्वाणि भूत़ानि न त्वम शोचितुम अर्हसि ।। 2/30 ।।

इस कारण  सब भूतों के लिए नहीं तुम शोच सकते 

स्वधर्मम अपि च अवेक्ष्य न विकम्पितुम अर्हसि

और स्वधर्म के अनुसार भी नही तुम्हें विकंपित होना चाहिए

धर्मात हि  युद्धात श्रेय: अन्यत क्षत्रियस्य न विद्यते ।। 2/31 ।।

 धर्मानुसार भी क्योंकि युद्ध ही श्रेष्ट है इसके अन्य क्षत्रिय के नहीं विद्यमान 

यदृच्छय़ा  च उपपन्नं स्वर्ग द्वारं अपावृतं 

और जब अनापेक्षित मिल गया खुला हुआ स्वर्ग द्वार 

सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धम ईदृशम  ।।    2/32   ।।

सुखदायक  क्षत्रिय के लिए पार्थ !सौभाग्य युद्ध का इस प्रकार के 

अथ चेत त्वं इमम धर्म्यं  संग्रामं न करिष्यसि 

किन्तु यदि तू  इस प्रकार का धार्मिक संग्राम नहीं करेगा

ततः स्वधर्मं कीर्तिम च हित्वा पापं अवाप्स्यसि  ।।    2/33   ।।

तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को अवाप्त होगा 

अकीर्तिम च अपि भूतानि  कथयिषयन्ति ते अव्ययाम 

और अकीर्ति (बदनामी ) भी लोग कथा रूप में कहेंगे तेरी ख़तम नहीं होने वाली 

सम्भावितस्य च अकीर्ति मरणात अतिरिच्यते   ।।   2/34   ।।

और यह भी संभव है कि अकीर्ति मरने सके बाद अधिक बढ़ जाये 
भयात रणात उपरतं मंस्यन्ते त्वाम महारथा:
भय से रण से हट़ा  हुआ मानेगे तम्हें  महारथी लोग  
येषाम च त्वं बहुमत:भूत्वा यास्यसि लाघवं   ।।   2/35   ।।
और ऐसे में तुम बहुमत में मान्यता प्राप्त लघुता को प्राप्त करोगे 

अवाच्यवादान च बहून  वदिष्यन्ति तव अहिताः 

और अशोभनीय बहुत सारी  बातें बताएँगे तेरे अहित में 

निन्दन्तः तव सामर्थ्यं ततः दुःखतरम नु किम    ।।    2/36   ।।

निंदा करेंगे तेरे सामर्थ्य की इससे अधिक दुःखतर स्थिति कुछ नहीं 

हतः वा प्राप्स्यसि स्वर्गम जित्वा वा भोक्ष्यसे  महीम 

मारा जाकर या तो प्राप्त करेगा स्वर्ग को या फिर जीत कर भोगेगा महीम 

तस्मात् उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृत निश्चयः   ।।    2/37   ।।

इस कारण उठ कौन्तेय युद्ध करने का निश्चय कर

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ 

 सुख दुःख में सम रह कर सम रह लाभ अलाभ जय अजय में 

ततःयुद्धाय युज्यस्व न एवं पापं अवाप्स्यसि   ।।   2/38  ।।

अतः अब युद्ध के लिए तैयार हो जा नहीं इस प्रकार पाप को प्राप्त होगा 

एशा ते अभिहिता सांख्ये बुद्धि योगे तु इमाम  श्रृणु 

ये सब तुझे हित के लिए कही गयी सांख्य बुद्धि योग किन्तु इसको सुन बुद्धि योग 

बुद्धया युक्त:यया पार्थ कर्मबंधनम प्रहास्यसि   ।।   2/39  ।।

जिससे बुद्धि से युक्त पार्थ ! कर्म बंधन से हंसते हंसते छूट जाएगा 

न इह अभिक्रमनाशः अस्ति प्रत्यवाय: न विद्यते 

न तो इसमें अभिक्रम का नाश होता है न इसमें प्रत्यावर्तन विद्यमान है 

स्वल्पं अपि अस्य धर्मस्य त्रायते महतः भयात  ।।   2/40   ।।

स्वं अल्प भी इस बुद्धि का योग धर्म धारण करे तो पार कर जाता है महत भय को 

व्यवसायात्मिका  बुद्धि एका इह कुरुनन्दन 

 व्यवसाय आत्मिका बुद्धि एक ही हो कुरुनन्दन 

बहुशाखा: हि अनन्ता: च बुद्धय: अव्यवसायिनाम   ।।   2/41  ।। 

क्योंकि बहुत शाखाओं वाली और अनंत बुद्धि अव्यवसायी के होती है


क्रमशः